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Entertainment News: अमिताभ बच्चन ने क्यों छोड़ी राजनीति, दोस्त राजीव गांधी के समर्थन में बने थे सांसद

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | अमिताभ बच्चन ने 1984 में इलाहाबाद से लोकसभा चुनाव जीतकर राजनीतिक पारी शुरू की थी। जानिए बोफोर्स विवाद और उनके इस्तीफे की पूरी कहानी।

दिल्ली, 10 अक्टूबर: हिंदी सिनेमा में अपनी दमदार आवाज, अभिनय और शानदार संवाद अदायगी से करोड़ों लोगों के दिलों पर राज करने वाले अमिताभ बच्चन ने एक समय राजनीति में भी अपनी किस्मत आजमाई थी। फिल्मों में अन्याय के खिलाफ लड़ने वाले 'एंग्री यंग मैन' की छवि रखने वाले बिग बी ने जब चुनावी मैदान में कदम रखा, तो उनकी जीत ने देश की राजनीति में हलचल मचा दी थी। लेकिन जिस राजनीतिक सफर की शुरुआत ऐतिहासिक जीत से हुई, उसका अंत महज तीन साल के भीतर हो गया।

अमिताभ बच्चन ने राजनीति में आने का फैसला किसी लंबे राजनीतिक संघर्ष या सत्ता हासिल करने की महत्वाकांक्षा के तहत नहीं, बल्कि अपने पुराने दोस्त राजीव गांधी के समर्थन में लिया था। हालांकि, राजनीतिक जीवन में उन्हें जिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, उन्होंने आखिरकार उन्हें सक्रिय राजनीति से दूर होने के लिए मजबूर कर दिया।

राजीव गांधी से दोस्ती ने राजनीति तक पहुंचाया

अमिताभ बच्चन का जन्म 11 अक्टूबर 1942 को इलाहाबाद में हुआ था, जिसे अब प्रयागराज के नाम से जाना जाता है। उनके पिता हरिवंश राय बच्चन हिंदी साहित्य के प्रतिष्ठित कवि थे। अमिताभ ने फिल्मों में अपनी अलग पहचान बनाई और धीरे-धीरे देश के सबसे लोकप्रिय अभिनेताओं में शामिल हो गए।

साल 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। उनके बेटे राजीव गांधी कांग्रेस के प्रमुख नेता के रूप में उभरे। अमिताभ बच्चन और राजीव गांधी के परिवारों के बीच पुराने संबंध थे। इसी दोस्ती और भावनात्मक जुड़ाव के कारण अमिताभ ने कांग्रेस के साथ जुड़ने का फैसला किया।

राजीव गांधी के समर्थन में राजनीति में उतरे अमिताभ बच्चन ने 1984 के लोकसभा चुनाव में इलाहाबाद सीट से अपनी उम्मीदवारी पेश की। उस समय उनके सामने उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और अनुभवी नेता हेमवती नंदन बहुगुणा थे।

चुनावी मैदान में मिली ऐतिहासिक जीत

1984 के लोकसभा चुनाव में अमिताभ बच्चन की लोकप्रियता का असर साफ दिखाई दिया। फिल्मी दुनिया में उनकी मजबूत पहचान और राजीव गांधी के समर्थन ने उनके पक्ष में माहौल बनाया।

अमिताभ बच्चन ने हेमवती नंदन बहुगुणा को भारी मतों के अंतर से पराजित किया। उनकी जीत उस चुनाव की चर्चित घटनाओं में शामिल रही। एक लोकप्रिय फिल्म अभिनेता का इतने बड़े अंतर से चुनाव जीतना उस दौर में राजनीति और मनोरंजन जगत के रिश्तों की भी अहम मिसाल बना।

हालांकि, चुनाव जीतना और राजनीति में लंबे समय तक टिके रहना दो अलग-अलग बातें थीं। अमिताभ बच्चन के सामने अब संसद और राजनीतिक व्यवस्था के भीतर काम करने की चुनौती थी।

बोफोर्स विवाद से बढ़ीं मुश्किलें

अमिताभ बच्चन की राजनीतिक पारी उस समय मुश्किलों में घिर गई, जब 1980 के दशक के उत्तरार्ध में बोफोर्स सौदे को लेकर देश की राजनीति में बड़ा विवाद खड़ा हुआ। इस मामले ने तत्कालीन कांग्रेस सरकार और राजीव गांधी की छवि को प्रभावित किया।

विवाद के दौरान अमिताभ बच्चन और उनके भाई अजिताभ बच्चन का नाम भी चर्चाओं में आया। अमिताभ ने अपने ऊपर लगे आरोपों का खंडन किया था। इस पूरे प्रकरण के कारण उन्हें मीडिया की तीखी निगरानी और राजनीतिक आलोचनाओं का सामना करना पड़ा।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि किसी विवाद में नाम आने और आरोप साबित होने के बीच अंतर होता है। अमिताभ बच्चन ने आरोपों को गलत बताया था और बाद में उन्हें इस मामले में राहत मिली।

लगातार विवादों और राजनीति के माहौल से असहज होने के बीच अमिताभ बच्चन ने लोकसभा की सदस्यता छोड़ने का फैसला किया।

जुलाई 1987 में दिया इस्तीफा

अमिताभ बच्चन ने जुलाई 1987 में लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। इस फैसले के साथ ही उनकी संसदीय राजनीति का अंत हो गया।

उनकी राजनीतिक पारी करीब तीन साल चली। जिस अभिनेता ने चुनाव में शानदार जीत हासिल की थी, उसने अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले ही संसद छोड़ दी। इसके बाद अमिताभ बच्चन ने सक्रिय चुनावी राजनीति में दोबारा कदम नहीं रखा।

उनका यह फैसला भारतीय राजनीति के उन चर्चित प्रसंगों में शामिल हो गया, जहां लोकप्रियता चुनाव जिताने में तो मददगार बनी, लेकिन राजनीतिक जीवन में बने रहने की गारंटी नहीं दे सकी।

राजनीति से दूरी, फिल्मों में फिर मजबूत वापसी

राजनीति छोड़ने के बाद अमिताभ बच्चन ने अपना ध्यान फिल्मों और अभिनय पर केंद्रित किया। हालांकि, उनके करियर में आर्थिक और व्यावसायिक चुनौतियां भी आईं। उनकी कंपनी एबीसीएल को भी गंभीर आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ा।

इसी दौर में उद्योगपति और राजनेता अमर सिंह के साथ बच्चन परिवार की नजदीकियां बढ़ीं। अमिताभ बच्चन की पत्नी जया बच्चन ने समाजवादी पार्टी के साथ राजनीतिक पारी जारी रखी और राज्यसभा की सदस्य बनीं।

जया बच्चन वर्ष 2004 से समाजवादी पार्टी की ओर से राज्यसभा में प्रतिनिधित्व करती रही हैं। इस तरह अमिताभ बच्चन ने जहां सक्रिय चुनावी राजनीति से दूरी बनाए रखी, वहीं उनकी पत्नी राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय रहीं।

अमिताभ बच्चन ने खुद क्या बताई थी राजनीति छोड़ने की वजह?

अमिताभ बच्चन ने एक इंटरव्यू में राजनीति में आने के अपने फैसले को भावनात्मक बताया था। उनके बयान का सार यही था कि वह अपने दोस्त की मदद करने के इरादे से राजनीति में आए थे, लेकिन वहां के माहौल को समझने के बाद उन्हें लगा कि यह क्षेत्र उनके स्वभाव के अनुकूल नहीं है।

उनके इस अनुभव से यह बात सामने आती है कि किसी लोकप्रिय व्यक्ति का राजनीति में प्रवेश हमेशा लंबे राजनीतिक करियर में नहीं बदलता। अमिताभ बच्चन के मामले में दोस्ती और भावनात्मक जुड़ाव ने उन्हें चुनावी मैदान तक पहुंचाया, लेकिन राजनीतिक परिस्थितियों ने उन्हें जल्द ही उससे दूर कर दिया।

आज अमिताभ बच्चन भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली कलाकारों में गिने जाते हैं। उनकी राजनीतिक पारी भले ही छोटी रही, लेकिन 1984 की ऐतिहासिक जीत और 1987 के इस्तीफे की कहानी आज भी चर्चा में रहती है।

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